तय करो किस ओर हो तुम?

एमए के दिनों की बात है। तब तक शायद मैं एक अच्छी हिन्दू लड़की थी। मुझे लगता है आप सब मेरे अभिप्राय को समझ गए होंगे। बहरहाल उन्हीं दिनों यूनिवर्सिटी प्रांगण में सरस्वती पूजा के मौके पर सरस्वती की मूर्ति लगाई गई थी। अब जबकि मैं एक अच्छी हिन्दू लड़की थी, तो वहाँ होना मैंने ज़रूरी समझा और इसी भूल से इलियट की कक्षा जो मेरे प्रिय अध्यापक की होती थी, छूट गई। जब मैं क्लास रूम तक आई तो देखा कि वे प्रिय अध्यापक गिने चुने विद्यार्थियों को बड़ी तसल्ली से पढ़ा रहे थे। मैं धीरे से जगह ढूंढ बैठ गई। कुछ समय बाद देर होने की वज़ह पर बात चली तो मैंने कह दिया कि सरस्वती की पूजा थी और वहाँ तो आपको भी होना था। उन्होने पूरी स्पष्टता से कहा कि किसी ने आपको बताया नहीं – मैं नास्तिक हूँ। मैं हैरान! मेरी समझ से परे था कि ज्ञान की देवी सरस्वती को कौन नहीं मानता। पर उसके आगे की उनकी बात मेरे साथ आज तक है- किसी भी लोकतान्त्रिक स्पेस में धार्मिक प्रैक्टिस नहीं किए जाने चाहिए। इस बात को मैं आज तक मानती आ रही हूँ। पर ऐसा होता कहाँ है! समाज की विविधता धर्म आधारित होकर ही सुंदर हो सकती है, ऐसा मुझे नहीं लगता। समाज को, हम सबको उदारता की ज़रूरत है जबकि धर्म हमें रिस्ट्रिक्ट करता है। पवित्रता-अपवित्रता के जाल में उलझाता है।

बहरहाल, शिक्षा एक रास्ता है जिस पर चलकर हम सुंदर दिखावे में छिपी सड़ांध को देख सकें, पहचान सकें। यह रास्ता लंबा ज़रूर हो सकता है पर ज़रा सोचें कि इन रास्तों के दरवाज़े ही बंद कर दिए जाएँ फ़िर तो ये रास्ते खो ही जाएंगे न! उन रास्तों को, उन खिड़कियों को खुला रहने दीजिए जिनके सहारे तमाम जंजीरों, बंधनों, गुलामियों को पहचाना जा सके और उन्हें उतार फेंका जा सके, जिसके मार्फत हम खुद के मुकम्मल इंसान होने को चीन्ह सकें, जान सकें।

मैं बिलकुल सहमत हूँ कि धार्मिक हस्तक्षेप सार्वजनिक जगहों पर नहीं होने चाहिए पर हम तो रोज़ मंत्रोच्चार से दिन की शुरुआत करते हैं। हर हिन्दू त्योहारों पर आरती गाते हैं! – और यह सब आपके, हमारे कार्य-स्थलों पर भी होता है। धर्म आपके जीवन में इस तरह घुसा हुआ है कि किसी के खुद को नास्तिक कहने और इन धार्मिक अभ्यासों से खुद को दूर रखने पर सबकी निगाहें उसे घूरने लगती हैं इस कदर कि डर जाता है वह इंसान!  ऐसे में किसी धर्म विशेष को बात-बेबात पर टार्गेट करना एक राजनीति है जिसे समझे जाने की ज़रूरत है। हमारे समाज में, हमारे ज़ेहन में नफ़रती हवाओं को भरने की राजनीति को समझने की ज़रूरत है। और यह राजनीति बहुत तेज़ी से कामयाब होती जा रही है- इसे समझने के लिए आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। आपके पहनावे, आपके नाक का नोज़ रिंग, आपकी दाढ़ी के बाल, आपका खानपान, आपकी आँखों का काजल – बहुत कुछ से इसकी पहचान की जाती है, रोज़ की जाती है।

BJP is in power in the state. There is no space for hijab or such things. School is a (Goddess) Saraswati Temple. It is everyone’s duty to study within rules framed by the school. Talibanisation will not be allowed.” Karnatak BJP President Nalin Kumar Kateel. (ThePrint.in से)

भारतीय जनता पार्टी के नेता व कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष महोदय की इस टिप्पणी को पढ़िए, यदि एक बार में उनकी बातें क्लियर नहीं हो रहीं, तो दुबारा पढ़िए, बार-बार पढ़िए। जो महोदय विद्यालय परिसर में किसी धर्म विशेष के पहनावे से परिसर के तालीबानीकरन की संभावना से आक्रांत हैं, वे विद्यालय परिसर को किसी दूसरे धर्म का पूजा स्थल बता रहे हैं। अब मंदिर और देवी सरस्वती क्या धर्म से परे हैं!

नेता महोदय की टिप्पणी और हो रही राजनीति को देखते हुए गोरख पाण्डेय की कविता याद आती है:

वे डरते हैं

किस बात से डरते हैं वे

तमाम धन दौलत, गोला- बारूद, पुलिस फौज़ के बावजूद

वे डरते हैं कि एक दिन

गरीब और निहत्थे लोग

उनसे डरना बंद कर देंगे।

गोरख पाण्डेय

यह तो बहुत स्पष्ट है कि एक स्थिति के समक्ष दूसरी स्थिति खड़ी करके हम नफ़रतों को क्रिएट कर रहे हैं। सांविधानिक तौर पर आप किसी को न शिक्षा के अधिकार से वंचित कर सकते हैं और न ही सांस्थानिक नियमों की आड़ में जबरन पहनावा निर्धारित कर सकते हैं।

आप ज़रा पूर्व केंद्रीय मंत्री बसनगौड़ा पाटिल  की बात भी सुनिए, गौर से सुनिए-

If you ask me, Madrasas should be banned too, Urdu Schools as well. Learn in Kannada, else go to Pakistan. What work do you have here? You want hijab, you want Urdu and all Islamic Practices then go to Pakistan.” (ThePrint.in से)

पाटिल साब की इस टिप्पणी में कितनी नफ़रत है- किसी तहज़ीब से, किसी ज़ुबान से, किसी संस्कृति से! उदार कहे जाने वाले इस देश में जब कट्टरता इस तरह गढ़ी जाए तो हमें सचेत होने की ज़रूरत है, औरों को सचेत करने की ज़रूरत है। क्योंकि ‘हिन्दू मुस्लिम एक हैं’ जैसे नारे दे देने से सब कुछ नारे जैसा नहीं हो जाता। इस देश को अपने इस्लामोफाबिया से खुद लड़ना है और बाहर निकलना है। एक ख़ास तबके को लेकर आपकी नफ़रत सिर्फ़ आपके नहीं, पूरे देश के मिजाज़ पर असर डाल रही है। एक खूबसूरत ज़ुबान को भी आप उसी नफ़रत से देख रहे हैं। आपकी पूजा गर पवित्र है तो दूसरे की अक़ीदत पर सवाल उठाने का हक़ आपको कतई नहीं है। आप जय श्री राम के शोर में नफ़रत फैला रहे हैं जिसकी पहचान के खिलाफ़, वह अपने डर में अपने अल्लाह को याद कर रहा है तो आप वहाँ भी राजनीति करने लगे। देश का बंटवारा और पाकिस्तान का बनना इतिहास की बात है पर आप अपने इस्लामोफोबिया की वज़ह से पाकिस्तान को हर वक़्त अपने वर्तमान में बनाए हुए हैं! निकलिए इस इस्लामोफोबिया से और इस देश को उतना ही खूबसूरत बनने दीजिए, जिसका स्वप्न हमें हमारा संविधान देता है।

हिज़ाब, पर्दा जैसी तमाम प्रथाएँ पितृसत्ता द्वारा तैयार की गई हैं, जिसे चुनौती आप तब दे सकेंगे, जब आप पढ़ेंगे, सीखेंगे, सोचेंगे- पर जो नफ़रत आज फैलाई जा रही है, उसके ज़रिए आप इन प्रथाओं को तोड़ना नहीं चाहते बल्कि किसी कौम को उत्पीड़ित करना चाहते हैं- यह पूरी तरह स्पष्ट है। इस देश के बहुरंगी मिजाज़ से एक खास रंग को साजिशन अलग करने की कोशिश की जा रही है, जिसे समझना, जिसे चैलेंज करना बहुत ज़रूरी है। अपनी शिक्षा व्यवस्था को इतना उन्नत बनाइए, अपने समाज को इतना विकसित बनाइए, कि हर इंसान यहाँ अपनी इंसानी पहचान के साथ स्वीकार किया जाए- न थोड़ा कम, न थोड़ा ज़्यादा! फ़िर देखिएगा ये तमाम जाल/ बंधन टूट ही जाएंगे और लड़कियां आज़ाद हो ही जाएंगी और सिर्फ पब्लिक स्पेस में ही नहीं, घर की दीवारों के भीतर भी वे पितृसत्ता की तमाम बेड़ियों को तोड़ डालेंगी और आज़ाद हो जाएंगी। उनका घूंघट, उनका हिज़ाब परचम बन कर लहराएगा उस दिन और यह होना ही है!

पर सवाल यह है कि क्या आप वाकई ऐसा चाहते हैं? मैं पितृसत्ता के किसी भी औज़ार के साथ नहीं हूँ, पर मैं शिक्षा के हक़ में हूँ क्योंकि मुझे पता है कि इसी शिक्षा से हम एक दिन पितृसत्ता के उन तमाम औज़ारों को तोड़ डालेंगे। मैं शिक्षा के अपने हक़ को मांगती उस लड़की के साथ हूँ। अब, तय आपको करना है कि आप आखिर किस ओर हैं?

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