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इंकलाब और मुहब्बत से लबरेज़ अहमद फ़राज़

अगर मैं अपने आस-पास होने वाली दुखद घटनाओं का मूक दर्शक बना रहा तो मेरी अंतरात्मा मुझे माफ नहीं करेगी। कम से कम मैं यह कर सकता हूं कि तानाशाही व्यवस्था को पता चले कि मैं कहाँ खड़ा हूँ जब एक आम आदमी के मौलिक अधिकार हड़प लिए गए हैं – अहमद फ़राज़

भाषाएँ पूरे जीवन को अपने कंधों पर उठा कर चलती हैं – सत्यपाल सहगल

सवाल करना हल की दिशा में पहला कदम है। इसलिए हर ज़रूरी मसलों पर सवाल उठाते रहना चाहिए। फ़र्क पड़ता है – सत्यपाल सहगल

संस्थाएं स्वतंत्र और निर्भीक व्यक्तियों को अफोर्ड ही नहीं कर सकती – शायदा बानो

हम इंसान के तौर पर कहाँ जा रहे हैं हैं मुझे नहीं मालूम।, इसमें हमारे समाज का ढांचा कितना  जिम्मेदार है मैं नहीं जानती पर यह सवाल तो है ही कि हम कितना निष्पक्ष और समतामूलक समाज बना पा रहे हैं?  

“आपने घबराना नहीं है” के स्लोगन के साथ एक सुंदर जगह सिरजता सीमांचल लाइब्रेरी फाउंडेशन

साकिब कहते हैं: “दरअसल सीमित संसाधन होने की वजह से हमारा कैनवास थोड़ा छोटा है। इसलिए जो बच्चे लगातार आ रहे हैं और इन्सान बने रहने में जिनका यकीन है, फ़िलहाल हम उन पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं।”  

एक बेहतर समाज के लिए मौलिक चिंतन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है – सुरजीत पातर

सामाज में जो क्लास डिविजन है, उसमें हायर क्लास के लोगों को लगता है कि उनके कपडे भी अलग हों और ज़बान भी अलग हों, तभी वे उच्च रह सकेंगे। बड़े माने जाएंगे। इसे बदलने का सबसे बड़ा तरीका यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक भाषा नीति होनी ही चाहिए|

आप भी मुक्त हों और दूसरों को भी मुक्त करें – डॉ. सरबजीत सिंह के साथ बातचीत

डॉ सरबजीत सिंह पेशे से प्रोफेसर व अध्यक्ष है, पंजाबी विभाग, पंजाबविश्वविद्यालय चंडीगढ़ के। डॉ सरबजीत सिंह स्वभाव से शिक्षक के साथ साथ एक्टिविस्ट हैं, सामाजिक न्याय के पक्षधर हैं और बराबरी वाले एक सुंदर समाज को गढ़ने में योगदान दे रहे हैं। आप सबके लिए पेश हैं डॉ सरबजीत सिंह से हुई बातचीत :

जीवन को बचा लेने, सुंदर बना लेने की चाह रखती भगवत रावत की कविता – ‘करुणा’

प्रगतिशील कवि भगवत रावत का जन्म 13 सितम्बर, 1939; ग्राम—टेहेरका, ज़‍िला—टीकमगढ़ (म.प्र.) में हुआ। भगवत रावत समकालीन हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवि, साहित्यकार और मेहनतकश मज़दूरों के प्रतिनिधि कवि के रूप में प्रसिद्ध रहे। उन्होने समाज की अमानवीय स्थितियों के विरोध में भी कई कविताएं लिख। वे मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और ‘वसुधा’ पत्रिका  के संपादक भी रहे। भगवत रावत …

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सच को उजागर करती राजेश जोशी की कविता: ‘मारे जाएंगे’

आइए, आज प्रतिबद्ध कवि राजेश जोशी की एक कविता “मारे जाएंगे” पढ़ते हैं| यह कविता एक सच है, अपने लिखे जाने के समय के साथ-साथ यह आज के समय का भी सच है, सच जिसे ढक दिया जाता है, छिपा दिया जाता है, उसे राजेश जोशी अपनी कविताई में उजागर कर देते हैं और उनकी यह प्रतिबद्धता उनकी ज़िद भी है। यह कविता राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘प्रतिनिधि कविताएं: राजेश जोशी’ संकलन में मौजूद है।

आइए, आज कथाकार रेणु के जन्मदिन पर उनकी कहानी ठेस पढ़ते हैं

04 मार्च 1921 को अररिया, बिहार के औराही हिंगना में जन्मे फणीश्वर नाथ रेणु मैट्रिक पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बीएचयू गए, मगर 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. स्वभाव से क्रांतिकारी रेणु ने देश में आपातकाल लगने पर पद्मश्री और बिहार सरकार की तरफ से मिलने वाले ₹300 पेंशन को लौटा दिया था.

ज़िन्दगी को भी प्यार की दरकार है…

हम स्वास्थ्य की बात करते तो हैं पर हम स्वास्थ्य को लेकर कितने संजीदा और कितने संवेदनशील हैं, यह भी सोचने की हमें ज़रूरत है। एक समस्या हमारे साथ यह भी है जो चीज़ें हमें दीखती नहीं, हम उनके होने की संभावना तक को नकार देते हैं। हालांकि ऊपर कही अपनी ही बात पर यदि फिर से ठहर कर सोचूं तो पाती हूं कि ऐसा नहीं है कि वे चीज़ें दीखती नहीं हैं। यहाँ यह कहना ज़्यादा सही और बेहतर होगा कि हमने देखने समझने के लिए एक अलग घेरा, एक अलग दायरा बनाया हुआ है और उसके बाहर की चीज़ें हमें असली ही नहीं लगतीं इसलिए हम बार बार उसे अनदेखा करते हैं।