जनता का आदमी | आलोक धन्वा की 1972 में प्रकाशित हुई यह कविता

2 जुलाई सन् 1948 में बिहार मुंगेर जिले में जन्मे आलोक धन्वा की पहली कविता 'जनता का आदमी' 1972 में 'वाम' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। 

सुंदर सुबह की उम्मीद को कामिल करने को प्रयासरत : शबनम

शबनम 2015 से वीडियो वॉलेंटियर के साथ जुड़ी हुई हैं और समृद्ध सांस्कृतिक-राजनीतिक विरासत वाले वाराणसी क्षेत्र में बतौर वीडियो एक्टिविस्ट काम कर रही हैं। वे अब तक कई महत्वपूर्ण विषयों मसलन सफ़ाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, जेंडर आदि पर रिपोर्टिंग कर चुकी हैं। स्त्री शिक्षा के लिए वे अतिरिक्त प्रयास कर रही हैं और अपने समुदाय में उन्होंने एक डिस्कशन क्लब बनाया हुआ है जिसके माध्यम से वे लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक बना रही हैं क्योंकि वे इस बात में यकीन करती हैं कि शिक्षा के ज़रिए ही बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।

तय करो किस ओर हो तुम?

मैं पितृसत्ता के किसी भी औज़ार के साथ नहीं हूँ, पर मैं शिक्षा के हक़ में हूँ क्योंकि मुझे पता है कि इसी शिक्षा से हम एक दिन पितृसत्ता के उन तमाम औजारों को तोड़ डालेंगे। मैं शिक्षा के अपने हक़ को मांगती उस लड़की के साथ हूँ। अब, तय आपको करना है कि आप आखिर किस ओर हैं?